श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः

प्रधानमूलान्महतः प्रसूतः।

अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु-

र्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्‍च॥ ३२

yo'sau guṇakṣobhakṛto vikāraḥ

pradhānamūlānmahataḥ prasūtaḥ|

ahaṃ trivṛnmohavikalpahetu-

rvaikārikastāmasa aindriyaśca|| 32

अर्थ

प्रकृतिसे महत्तत्त्व बनता है और महत्तत्त्वसे अहंकार। इस प्रकार यह अहंकार गुणोंके क्षोभसे उत्पन्‍न हुआ प्रकृतिका ही एक विकार है। अहंकारके तीन भेद हैं—सात्त्विक, तामस और राजस। यह अहंकार ही अज्ञान और सृष्टिकी विविधताका मूलकारण है॥ ३२॥✎ 1451

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1451 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृद्धि-ह्रस → वृद्धि-ह्रास

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