॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.30
ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा
विकल्पबुद्धीश्च गुणैर्विधत्ते।
वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेक-
मथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३०
mamāṅga māyā guṇamayyanekadhā
vikalpabuddhīśca guṇairvidhatte|
vaikārikastrividho'dhyātmameka-
mathādhidaivamadhibhūtamanyat || 30
अर्थ
प्रिय मित्र! मेरी माया त्रिगुणात्मिका है। वही अपने सत्त्व, रज आदि गुणोंसे अनेकों प्रकारकी भेदवृत्तियाँ पैदा कर देती है। यद्यपि इसका विस्तार असीम है, फिर भी इस विकारात्मक सृष्टिको तीन भागोंमें बाँट सकते हैं। वे तीन भाग हैं—अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत॥ ३०॥✎ 1451