श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा

विकल्पबुद्धीश्‍च गुणैर्विधत्ते।

वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेक-

मथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३०

mamāṅga māyā guṇamayyanekadhā

vikalpabuddhīśca guṇairvidhatte|

vaikārikastrividho'dhyātmameka-

mathādhidaivamadhibhūtamanyat || 30

अर्थ

प्रिय मित्र! मेरी माया त्रिगुणात्मिका है। वही अपने सत्त्व, रज आदि गुणोंसे अनेकों प्रकारकी भेदवृत्तियाँ पैदा कर देती है। यद्यपि इसका विस्तार असीम है, फिर भी इस विकारात्मक सृष्टिको तीन भागोंमें बाँट सकते हैं। वे तीन भाग हैं—अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत॥ ३०॥✎ 1451

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1451 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृद्धि-ह्रस → वृद्धि-ह्रास

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