कमलनयन श्रीकृष्ण! मेरे हृदयमें इनकी भिन्नता और अभिन्नताको लेकर बहुत बड़ा सन्देह है। आप तो सर्वज्ञ हैं, अपनी युक्तियुक्त वाणीसे मेरे सन्देहका निवारण कर दीजिये ॥ २७॥ भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥✎ 14491450
यह व्याख्या श्लोक 11.22.27 से 11.22.28 तककी एक साथ है।
प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि।
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।
छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः॥ २७
कमलनयन श्रीकृष्ण! मेरे हृदयमें इनकी भिन्नता और अभिन्नताको लेकर बहुत बड़ा सन्देह है। आप तो सर्वज्ञ हैं, अपनी युक्तियुक्त वाणीसे मेरे सन्देहका निवारण कर दीजिये ॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 849) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1449 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): जीवोंका → जीवोंको
#1450 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भगवान्! → भगवन्!