श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

मयोपबृंहितं भूम्‍ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।

भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७

mayopabṛṃhitaṃ bhūmnā brahmaṇānantaśaktinā|

bhūteṣu ghoṣarūpeṇa biseṣūrṇeva lakṣyate|| 37

अर्थ

उद्धव! मैं अनन्तशक्तिसम्पन्‍न एवं स्वयं अनन्त ब्रह्म हूँ। मैंने ही वेदवाणीका विस्तार किया है। जैसे कमलनालमें पतला-सा सूत होता है, वैसे ही वह वेदवाणी प्राणियोंके अन्तः-करणमें अनाहतनादके रूपमें प्रकट होती है॥ ३७॥✎ 1760 1761 1937 1990

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1760 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनन्त-शक्ति-सम्पन्‍न → अनन्त-शक्तिसम्पन्‍न
  • #1761 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मन्त्र-द्रष्टा → मन्त्रद्रष्टा
  • #1937 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अनन्त-शक्ति → अनन्तशक्ति
  • #1990 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मूर्त्ति → मूर्ति

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