उद्धव! मैं अनन्तशक्तिसम्पन्न एवं स्वयं अनन्त ब्रह्म हूँ। मैंने ही वेदवाणीका विस्तार किया है। जैसे कमलनालमें पतला-सा सूत होता है, वैसे ही वह वेदवाणी प्राणियोंके अन्तः-करणमें अनाहतनादके रूपमें प्रकट होती है॥ ३७॥✎ 1760176119371990
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।
भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७
उद्धव! मैं अनन्तशक्तिसम्पन्न एवं स्वयं अनन्त ब्रह्म हूँ। मैंने ही वेदवाणीका विस्तार किया है। जैसे कमलनालमें पतला-सा सूत होता है, वैसे ही वह वेदवाणी प्राणियोंके अन्तः-करणमें अनाहतनादके रूपमें प्रकट होती है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.21.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 844) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)