श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।

अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६

śabdabrahma sudurbodhaṃ prāṇendriyamanomayam|

anantapāraṃ gambhīraṃ durvigāhyaṃ samudravat|| 36

अर्थ

वेदोंका नाम है शब्दब्रह्म। वे मेरी मूर्ति हैं, इसीसे उनका रहस्य समझना अत्यन्त कठिन है। वह शब्दब्रह्म परा, पश्यन्ती और मध्यमा वाणीके रूपमें प्राण, मन और इन्द्रियमय है। समुद्रके समान सीमारहित और गहरा है। उसकी थाह लगाना अत्यन्त कठिन है। (इसीसे जैमिनि आदि बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके तात्पर्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाते)॥ ३६॥✎ 1760 1761 1937 1990

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1760 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनन्त-शक्ति-सम्पन्‍न → अनन्त-शक्तिसम्पन्‍न
  • #1761 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मन्त्र-द्रष्टा → मन्त्रद्रष्टा
  • #1937 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अनन्त-शक्ति → अनन्तशक्ति
  • #1990 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मूर्त्ति → मूर्ति

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