श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।

फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि॥ २६

evaṃ vyavasitaṃ kecidavijñāya kubuddhayaḥ|

phalaśrutiṃ kusumitāṃ na vedajñā vadanti hi|| 26

अर्थ

दुर्बुद्धिलोग (कर्मवादी) वेदोंका यह अभिप्राय न समझकर कर्मासक्तिवश पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंका वर्णन देखते हैं और उन्हींको परम फल मानकर भटक जाते हैं। परन्तु वेदवेत्ता लोग श्रुतियोंका ऐसा तात्पर्य नहीं बतलाते॥ २६॥✎ 1759

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1759 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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