श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।

कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः॥ २५

na tānaviduṣaḥ svārthaṃ bhrāmyato vṛjinādhvani|

kathaṃ yuñjyāt punasteṣu tāṃstamo viśato budhaḥ|| 25

अर्थ

वे अपने परम पुरुषार्थको नहीं जानते, इसलिये स्वर्गादिका जो वर्णन मिलता है, वह ज्यों-का-त्यों सत्य है—ऐसा विश्‍वास करके देवादि योनियोंमें भटकते रहते हैं और फिर वृक्ष आदि योनियोंके घोर अन्धकारमें आ पड़ते हैं। ऐसी अवस्थामें कोई भी विद्वान् अथवा वेद फिरसे उन्हें उन्हीं विषयोंमें क्यों प्रवृत्त करेगा?॥ २५॥✎ 1759

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1759 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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