श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।

भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते॥ १३

amedhyaliptaṃ yad yena gandhaṃ lepaṃ vyapohati|

bhajate prakṛtiṃ tasya tacchaucaṃ tāvadiṣyate|| 13

अर्थ

यदि किसी वस्तुमें कोई अशुद्ध पदार्थ लग गया हो तो छीलनेसे या मिट्टी आदि मलनेसे जब उस पदार्थकी गन्ध और लेप न रहे और वह वस्तु अपने पूर्वरूपमें आ जाय, तब उसको शुद्ध समझना चाहिये॥ १३॥

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