श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।

कालवाय्वग्‍निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥ १२

dhānyadārvasthitantūnāṃ rasataijasacarmaṇām|

kālavāyvagnimṛttoyaiḥ pārthivānāṃ yutāyutaiḥ|| 12

अर्थ

अनाज, लकड़ी, हाथीदाँत आदि हड्डी, सूत, मधु, नमक, तेल, घी आदि रस, सोना-पारा आदि तैजस पदार्थ, चाम और घड़ा आदि मिट्टीके बने पदार्थ समयपर अपने-आप हवा लगनेसे, आगमें जलानेसे, मिट्टी लगानेसे अथवा जलमें धोनेसे शुद्ध हो जाते हैं। देश, काल और अवस्थाके अनुसार कहीं जल-मिट्टी आदि शोधक सामग्रीके संयोगसे शुद्धि करनी पड़ती है तो कहीं-कहीं एक-एकसे भी शुद्धि हो जाती है॥ १२॥

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