॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.20.32
यत् कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत्।
योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि॥ ३२
yat karmabhiryattapasā jñānavairāgyataśca yat|
yogena dānadharmeṇa śreyobhiritarairapi|| 32
अर्थ
कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म और दूसरे कल्याणसाधनोंसे जो कुछ स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे ही, यदि चाहे तो, अनायास प्राप्त कर लेता है॥ ३२-३३॥✎ 1755