श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।

न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह॥ ३१

tasmānmadbhaktiyuktasya yogino vai madātmanaḥ|

na jñānaṃ na ca vairāgyaṃ prāyaḥ śreyo bhavediha|| 31

अर्थ

इसीसे जो योगी मेरी भक्तिसे युक्त और मेरे चिन्तनमें म‌ग्‍न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥ ३१॥✎ 1755

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1755 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कल्याण-स्वरूप → कल्याणस्वरूप

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