na jñānaṃ na ca vairāgyaṃ prāyaḥ śreyo bhavediha|| 31
अर्थ
इसीसे जो योगी मेरी भक्तिसे युक्त और मेरे चिन्तनमें मग्न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥ ३१॥✎ 1755
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।
न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह॥ ३१
इसीसे जो योगी मेरी भक्तिसे युक्त और मेरे चिन्तनमें मग्न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 838) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)