श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः।

मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३

nirviṇṇasya viraktasya puruṣasyoktavedinaḥ|

manastyajati daurātmyaṃ cintitasyānucintayā|| 23

अर्थ

जो पुरुष संसारसे विरक्त हो गया है और जिसे संसारके पदार्थोंमें दुःख-बुद्धि हो गयी है, वह अपने गुरुजनोंके उपदेशको भलीभाँति समझकर बार-बार अपने स्वरूपके ही चिन्तनमें संल‌ग्‍न रहता है। इस अभ्याससे बहुत शीघ्र ही उसका मन अपनी वह चंचलता, जो अनात्मा शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करनेसे हुई है, छोड़ देता है॥ २३॥✎ 1754

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1754 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति-योगसे → भक्तियोगसे

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