॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.20.22
सांख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमतः।
भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति॥ २२
sāṃkhyena sarvabhāvānāṃ pratilomānulomataḥ|
bhavāpyayāvanudhyāyenmano yāvat prasīdati|| 22
अर्थ
सांख्यशास्त्रमें प्रकृतिसे लेकर शरीरपर्यन्त सृष्टिका जो क्रम बतलाया गया है, उसके अनुसार सृष्टि-चिन्तन करना चाहिये और जिस क्रमसे शरीर आदिका प्रकृतिमें लय बताया गया है, उस प्रकार लय-चिन्तन करना चाहिये। यह क्रम तबतक जारी रखना चाहिये, जबतक मन शान्त—स्थिर न हो जाय॥ २२॥✎ 1754