श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

अथ विंशोऽध्यायः

ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग

उद्धव उवाच

विधिश्‍च प्रतिषेधश्‍च निगमो हीश्‍वरस्य ते।

अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम्॥ १

vidhiśca pratiṣedhaśca nigamo hīśvarasya te|

avekṣate'ravindākṣa guṇaṃ doṣaṃ ca karmaṇām|| 1

अर्थ

उद्धवजीने कहा—कमलनयन श्रीकृष्ण! आप सर्वशक्तिमान् हैं। आपकी आज्ञा ही वेद है; उसमें कुछ कर्मोंको करनेकी विधि है और कुछके करनेका निषेध है। यह विधि-निषेध कर्मोंके गुण और दोषकी परीक्षा करके ही तो होता है॥ १॥

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