श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.55

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा-

द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः ।

प्रणयरशनया धृताङ्‌घ्रिपद्मः

स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ ५५

visṛjati hṛdayaṃ na yasya sākṣā-

ddhariravaśābhihito'pyaghaughanāśaḥ |

praṇayaraśanayā dhṛtāṅghripadmaḥ

sa bhavati bhāgavatapradhāna uktaḥ|| 55

अर्थ

विवशतासे नामोच्चारण करनेपर भी सम्पूर्ण अघ-राशिको नष्ट कर देनेवाले स्वयं भगवान् श्रीहरि जिसके हृदयको क्षणभरके लिये भी नहीं छोड़ते हैं, क्योंकि उसने प्रेमकी रस्सीसे उनके चरण-कमलोंको बाँध रखा है, वास्तवमें ऐसा पुरुष ही भगवान्‌के भक्तोंमें प्रधान है॥ ५५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

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