॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.54
भगवत उरुविक्रमाङ्घ्रिशाखा-
नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स
प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कतापः॥ ५४
bhagavata uruvikramāṅghriśākhā-
nakhamaṇicandrikayā nirastatāpe|
hṛdi kathamupasīdatāṃ punaḥ sa
prabhavati candra ivodite'rkatāpaḥ|| 54
अर्थ
रासलीलाके अवसरपर नृत्य-गतिसे भाँति-भाँतिके पाद-विन्यास करनेवाले निखिल सौन्दर्य-माधुर्य-निधि भगवान्के चरणोंके अंगुलि-नखकी मणि-चन्द्रिकासे जिन शरणागत भक्तजनोंके हृदयका विरहजन्य संताप एक बार दूर हो चुका है, उनके हृदयमें वह फिर कैसे आ सकता है, जैसे चन्द्रोदय होनेपर सूर्यका ताप नहीं लग सकता॥ ५४॥