श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

इत्यच्युताङ्‌घ्रिं भजतोऽनुवृत्त्या ✎ 1214

भक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोधः ।

भवन्ति वै भागवतस्य राजं-

स्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात्॥ ४३

ityacyutāṅghriṃ bhajato'nuvṛttyā

bhaktirviraktirbhagavatprabodhaḥ |

bhavanti vai bhāgavatasya rājaṃ-

stataḥ parāṃ śāntimupaiti sākṣāt|| 43

अर्थ

राजन्! इस प्रकार जो प्रतिक्षण एक-एक वृत्तिके द्वारा भगवान्‌के चरणकमलोंका ही भजन करता है, उसे भगवान्‌के प्रति प्रेममयी भक्ति, संसारके प्रति वैराग्य और अपने प्रियतम भगवान्‌के स्वरूपकी स्फूर्ति—ये सब अवश्य ही प्राप्त होते हैं; वह भागवत हो जाता है और जब ये सब प्राप्त हो जाते हैं, तब वह स्वयं परम शान्तिका अनुभव करने लगता है॥ ४३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1214 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): इत्यच्युताङ्‌घ्र‌‌ि → इत्यच्युताङ्‌घ्रिं

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें