श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः।

संसारेऽस्मिन् क्षणार्धोऽपि सत्संगः शेवधिर्नृणाम्॥ ३०

ata ātyantikaṃ kṣemaṃ pṛcchāmo bhavato'naghāḥ|

saṃsāre'smin kṣaṇārdho'pi satsaṃgaḥ śevadhirnṛṇām|| 30

अर्थ

इसलिये त्रिलोकपावन महात्माओ! हम आपलोगोंसे यह प्रश्‍न करते हैं कि परम कल्याणका स्वरूप क्या है? और उसका साधन क्या है? इस संसारमें आधे क्षणका सत्संग भी मनुष्योंके लिये परम निधि है॥ ३०॥

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