इसलिये त्रिलोकपावन महात्माओ! हम आपलोगोंसे यह प्रश्न करते हैं कि परम कल्याणका स्वरूप क्या है? और उसका साधन क्या है? इस संसारमें आधे क्षणका सत्संग भी मनुष्योंके लिये परम निधि है॥ ३०॥
अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः।
संसारेऽस्मिन् क्षणार्धोऽपि सत्संगः शेवधिर्नृणाम्॥ ३०
इसलिये त्रिलोकपावन महात्माओ! हम आपलोगोंसे यह प्रश्न करते हैं कि परम कल्याणका स्वरूप क्या है? और उसका साधन क्या है? इस संसारमें आधे क्षणका सत्संग भी मनुष्योंके लिये परम निधि है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 716) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/2/30/