श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्॥ २९

durlabho mānuṣo deho dehināṃ kṣaṇabhaṃguraḥ|

tatrāpi durlabhaṃ manye vaikuṇṭhapriyadarśanam|| 29

अर्थ

जीवोंके लिये मनुष्य-शरीरका प्राप्त होना दुर्लभ है। यदि यह प्राप्त भी हो जाता है तो प्रतिक्षण मृत्युका भय सिरपर सवार रहता है, क्योंकि यह क्षणभंगुर है। इसलिये अनिश्‍चित मनुष्य-जीवनमें भगवान्‌के प्यारे और उनको प्यार करनेवाले भक्तजनोंका, संतोंका दर्शन तो और भी दुर्लभ है॥ २९॥

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