श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

भगो म ऐश्‍वरो भावो लाभो मद्भक्तिरुत्तमः।

विद्याऽऽत्मनि भिदाबाधो जुगुप्सा ह्रीरकर्मसु॥ ४० ✎ 1225

bhago ma aiśvaro bhāvo lābho madbhaktiruttamaḥ|

vidyā''tmani bhidābādho jugupsā hrīrakarmasu|| 40

अर्थ

मेरा ऐश्‍वर्य ही ‘भग’ है, मेरी श्रेष्ठ भक्ति ही उत्तम ‘लाभ’ है, सच्ची ‘विद्या’ वही है जिससे ब्रह्म और आत्माका भेद मिट जाता है। पाप करनेसे घृणा होनेका नाम ही ‘लज्जा’ है॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1225 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृरकर्मसु॥ → ह्रीरकर्मसु॥

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