श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्।

मयि संजायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥ २४

evaṃ dharmairmanuṣyāṇāmuddhavātmanivedinām|

mayi saṃjāyate bhaktiḥ ko'nyo'rtho'syāvaśiṣyate|| 24

अर्थ

उद्धवजी! जो मनुष्य इन धर्मोंका पालन करते हैं और मेरे प्रति आत्म-निवेदन कर देते हैं, उनके हृदयमें मेरी प्रेममयी भक्तिका उदय होता है और जिसे मेरी भक्ति प्राप्त हो गयी, उसके लिये और किस दूसरी वस्तुका प्राप्त होना शेष रह जाता है?॥ २४॥

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