अपने एक-एक अंगकी चेष्टा केवल मेरे ही लिये करे, वाणीसे मेरे ही गुणोंका गान करे और अपना मन भी मुझे ही अर्पित कर दे तथा सारी कामनाएँ छोड़ दे॥ २२॥
मदर्थेष्वंगचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥ २२
अपने एक-एक अंगकी चेष्टा केवल मेरे ही लिये करे, वाणीसे मेरे ही गुणोंका गान करे और अपना मन भी मुझे ही अर्पित कर दे तथा सारी कामनाएँ छोड़ दे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 830) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/19/22/