श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

मदर्थेष्वंगचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।

मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥ २२

madartheṣvaṃgaceṣṭā ca vacasā madguṇeraṇam|

mayyarpaṇaṃ ca manasaḥ sarvakāmavivarjanam|| 22

अर्थ

अपने एक-एक अंगकी चेष्टा केवल मेरे ही लिये करे, वाणीसे मेरे ही गुणोंका गान करे और अपना मन भी मुझे ही अर्पित कर दे तथा सारी कामनाएँ छोड़ दे॥ २२॥

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