॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.16.5
याः काश्च भूमौ दिवि वै रसायां
विभूतयो दिक्षु महाविभूते।
ता मह्यमाख्याह्यनुभावितास्ते
नमामि ते तीर्थपदाङ्घ्रिपद्मम्॥ ५
yāḥ kāśca bhūmau divi vai rasāyāṃ
vibhūtayo dikṣu mahāvibhūte|
tā mahyamākhyāhyanubhāvitāste
namāmi te tīrthapadāṅghripadmam|| 5
अर्थ
अचिन्त्य ऐश्वर्यसम्पन्न प्रभो! पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल तथा दिशा-विदिशाओंमें आपके प्रभावसे युक्त जो-जो भी विभूतियाँ हैं, आप कृपा करके मुझसे उनका वर्णन कीजिये। प्रभो! मैं आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जो समस्त तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले हैं॥ ५॥✎ 1747