सदा सावधान रहकर जागनेवालोंमें संवत्सररूप काल मैं हूँ, ऋतुओंमें वसन्त, महीनोंमें मार्गशीर्ष और नक्षत्रोंमें अभिजित् हूँ॥ २७॥✎ 1750
संवत्सरोऽस्म्यनिमिषामृतूनां मधुमाधवौ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहं नक्षत्राणां तथाभिजित्॥ २७
सदा सावधान रहकर जागनेवालोंमें संवत्सररूप काल मैं हूँ, ऋतुओंमें वसन्त, महीनोंमें मार्गशीर्ष और नक्षत्रोंमें अभिजित् हूँ॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 812) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)