श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

धर्माणामस्मि संन्यासः क्षेमाणामबहिर्मतिः।

गुह्यानां सूनृतं मौनं मिथुनानामजस्त्वहम्॥ २६

dharmāṇāmasmi saṃnyāsaḥ kṣemāṇāmabahirmatiḥ|

guhyānāṃ sūnṛtaṃ maunaṃ mithunānāmajastvaham|| 26

अर्थ

मैं धर्मोंमें कर्मसंन्यास अथवा एषणात्रयके त्यागद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदानरूप सच्चा संन्यास हूँ। अभयके साधनोंमें आत्मस्वरूपका अनुसन्धान हूँ, अभिप्राय-गोपनके साधनोंमें मधुर वचन एवं मौन हूँ और स्त्री- पुरुषके जोड़ोंमें मैं प्रजापति हूँ—जिनके शरीरके दो भागोंसे पुरुष और स्त्रीका पहला जोड़ा पैदा हुआ॥ २६॥✎ 1750

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)

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