॥ श्रीहरिः ॥
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालयः।
वनस्पतीनामश्वत्थ ओषधीनामहं यवः॥ २१
dhiṣṇyānāmasmyahaṃ merurgahanānāṃ himālayaḥ|
vanaspatīnāmaśvattha oṣadhīnāmahaṃ yavaḥ|| 21
अर्थ
मैं निवासस्थानोंमें सुमेरु, दुर्गम स्थानोंमें हिमालय, वनस्पतियोंमें पीपल और धान्योंमें जौ हूँ॥ २१॥✎ 1750
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालयः।
वनस्पतीनामश्वत्थ ओषधीनामहं यवः॥ २१
मैं निवासस्थानोंमें सुमेरु, दुर्गम स्थानोंमें हिमालय, वनस्पतियोंमें पीपल और धान्योंमें जौ हूँ॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 811) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)