॥ श्रीहरिः ॥
ब्रह्मर्षीणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनुः।
देवर्षीणां नारदोऽहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु॥ १४
brahmarṣīṇāṃ bhṛgurahaṃ rājarṣīṇāmahaṃ manuḥ|
devarṣīṇāṃ nārado'haṃ havirdhānyasmi dhenuṣu|| 14
अर्थ
मैं ब्रह्मर्षियोंमें भृगु, राजर्षियोंमें मनु, देवर्षियोंमें नारद और गौओंमें कामधेनु हूँ॥ १४॥✎ 1748 1749
ब्रह्मर्षीणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनुः।
देवर्षीणां नारदोऽहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु॥ १४
मैं ब्रह्मर्षियोंमें भृगु, राजर्षियोंमें मनु, देवर्षियोंमें नारद और गौओंमें कामधेनु हूँ॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 811) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
- #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान