॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.15.34
जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः।
योगेनाप्नोति ताः सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेत्॥ ३४
janmauṣadhitapomantrairyāvatīriha siddhayaḥ|
yogenāpnoti tāḥ sarvā nānyairyogagatiṃ vrajet|| 34
अर्थ
जगत्में जन्म, ओषधि, तपस्या और मन्त्रादिके द्वारा जितनी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे सभी योगके द्वारा मिल जाती हैं; परन्तु योगकी अन्तिम सीमा—मेरे सारूप्य, सालोक्य आदिकी प्राप्ति बिना मुझमें चित्त लगाये किसी भी साधनसे नहीं प्राप्त हो सकती॥ ३४॥