श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ध्यानेनेत्थं सुतीव्रेण युंजतो योगिनो मनः।

संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ्रमः॥ ४६

dhyānenetthaṃ sutīvreṇa yuṃjato yogino manaḥ|

saṃyāsyatyāśu nirvāṇaṃ dravyajñānakriyābhramaḥ|| 46

अर्थ

जो योगी इस प्रकार तीव्र ध्यानयोगके द्वारा मुझमें ही अपने चित्तका संयम करता है, उसके चित्तसे वस्तुकी अनेकता, तत्सम्बन्धी ज्ञान और उनकी प्राप्तिके लिये होनेवाले कर्मोंका भ्रम शीघ्र ही निवृत्त हो जाता है॥ ४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः

॥ १४॥

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