श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि।

विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम्॥ ४५

evaṃ samāhitamatirmāmevātmānamātmani|

vicaṣṭe mayi sarvātman jyotirjyotiṣi saṃyutam|| 45

अर्थ

जब इस प्रकार चित्त समाहित हो जाता है, तब जैसे एक ज्योति दूसरी ज्योतिसे मिलकर एक हो जाती है, वैसे ही अपनेमें मुझे और मुझ सर्वात्मामें अपनेको अनुभव करने लगता है॥ ४५॥

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