श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तस्मादसदभिध्यानं यथा स्वप्नमनोरथम्।

हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भावभावितम्॥ २८

tasmādasadabhidhyānaṃ yathā svapnamanoratham|

hitvā mayi samādhatsva mano madbhāvabhāvitam|| 28

अर्थ

इसलिये तुम दूसरे साधनों और फलोंका चिन्तन छोड़ दो। अरे भाई! मेरे अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, जो कुछ जान पड़ता है, वह ठीक वैसा ही है जैसे स्वप्न अथवा मनोरथका राज्य। इसलिये मेरे चिन्तनसे तुम अपना चित्त शुद्ध कर लो और उसे पूरी तरहसे—एकाग्रतासे मुझमें ही लगा दो॥ २८॥

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