॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.13.36
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा
सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम्।
दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः॥ ३६
dehaṃ ca naśvaramavasthitamutthitaṃ vā
siddho na paśyati yato'dhyagamat svarūpam|
daivādapetamuta daivavaśādupetaṃ
vāso yathā parikṛtaṃ madirāmadāndhaḥ|| 36
अर्थ
जैसे मदिरा पीकर उन्मत्त पुरुष यह नहीं देखता कि मेरे द्वारा पहना हुआ वस्त्र शरीरपर है या गिर गया, वैसे ही सिद्ध पुरुष जिस शरीरसे उसने अपने स्वरूपका साक्षात्कार किया है, वह प्रारब्धवश खड़ा है, बैठा है या दैववश कहीं गया या आया है—नश्वर शरीरसम्बन्धी इन बातोंपर दृष्टि नहीं डालता॥ ३६॥