श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्ण-

स्तूष्णीं भवेन्‍निजसुखानुभवो निरीहः।

संदृश्यते क्व च यदीदमवस्तुबुद्ध्या

त्यक्तं भ्रमाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात्॥ ३५

dṛṣṭiṃ tataḥ pratinivartya nivṛttatṛṣṇa-

stūṣṇīṃ bhavennijasukhānubhavo nirīhaḥ|

saṃdṛśyate kva ca yadīdamavastubuddhyā

tyaktaṃ bhramāya na bhavet smṛtirānipātāt|| 35

अर्थ

इसलिये उस देहादिरूप दृश्यसे दृष्टि हटाकर तृष्णारहित इन्द्रियोंके व्यापारसे हीन और निरीह होकर आत्मानन्दके अनुभवमें म‌ग्‍न हो जाय। यद्यपि कभी-कभी आहार आदिके समय यह देहादिक प्रपंच देखनेमें आता है, तथापि यह पहले ही आत्मवस्तुसे अतिरिक्त और मिथ्या समझकर छोड़ा जा चुका है। इसलिये वह पुनः भ्रान्तिमूलक मोह उत्पन्‍न करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। देहपातपर्यन्त केवल संस्कारमात्र उसकी प्रतीति होती है॥ ३५॥

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