श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्‍नानात्वमात्मनः।

नानात्वमात्मनो यावत् पारतन्त्र्यं तदैव हि॥ ३२✎ 2150

yāvat syād guṇavaiṣamyaṃ tāvannānātvamātmanaḥ|

nānātvamātmano yāvat pāratantryaṃ tadaiva hi|| 32

अर्थ

जबतक गुणोंकी विषमता है अर्थात् शरीरादिमें मैं और मेरेपनका अभिमान है; तभीतक आत्माके एकत्वकी अनुभूति नहीं होती—वह अनेक जान पड़ता है; और जबतक आत्माकी अनेकता है, तबतक तो उन्हें काल अथवा कर्म किसीके अधीन रहना ही पड़ेगा॥ ३२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2150 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): तन्त्रॺं तदै → तन्त्र्यं तदै

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