श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

गुणाः सृजन्ति कर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान्।

जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ॥ ३१

guṇāḥ sṛjanti karmāṇi guṇo'nusṛjate guṇān|

jīvastu guṇasaṃyukto bhuṅkte karmaphalānyasau|| 31

अर्थ

सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण इन्द्रियोंको उनके कर्मोंमें प्रेरित करते हैं और इन्द्रियाँ कर्म करती हैं। जीव अज्ञानवश सत्त्व, रज आदि गुणों और इन्द्रियोंको अपना स्वरूप मान बैठता है और उनके किये हुए कर्मोंका फल सुख-दुःख भोगने लगता है॥ ३१॥

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