॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.1.3
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य
गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः।
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं
यद् यादवं कुलमहो अविषह्यमास्ते॥ ३
bhūbhārarājapṛtanā yadubhirnirasya
guptaiḥ svabāhubhiracintayadaprameyaḥ|
manye'vanernanu gato'pyagataṃ hi bhāraṃ
yad yādavaṃ kulamaho aviṣahyamāste|| 3
अर्थ
अपने बाहुबलसे सुरक्षित यदुवंशियोंके द्वारा पृथ्वीके भार—राजा और उनकी सेनाका विनाश करके, प्रमाणोंके द्वारा ज्ञानके विषय न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने विचार किया कि लोकदृष्टिसे पृथ्वीका भार दूर हो जानेपर भी वस्तुतः मेरी दृष्टिसे अभीतक दूर नहीं हुआ; क्योंकि जिसपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह यदुवंश अभी पृथ्वीपर विद्यमान है॥ ३॥