श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रष्टुं विलज्जती साक्षात् प्रब्रूतामोघदर्शनाः।

प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किंस्वित् संजनयिष्यति॥ १५

praṣṭuṃ vilajjatī sākṣāt prabrūtāmoghadarśanāḥ|

prasoṣyantī putrakāmā kiṃsvit saṃjanayiṣyati|| 15

अर्थ

वे जाम्बवतीनन्दन साम्बको स्त्रीके वेषमें सजाकर ले गये और कहने लगे, ‘ब्राह्मणो! यह कजरारी आँखोंवाली सुन्दरी गर्भवती है। यह आपसे एक बात पूछना चाहती है। परन्तु स्वयं पूछनेमें सकुचाती है। आपलोगोंका ज्ञान अमोघ—अबाध है, आप सर्वज्ञ हैं। इसे पुत्रकी बड़ी लालसा है और अब प्रसवका समय निकट आ गया है। आपलोग बताइये, यह कन्या जनेगी या पुत्र?’॥ १४-१५॥

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें