श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

विश्‍वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुरंगिराः।

कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठो नारदादयः॥ १२

viśvāmitro'sitaḥ kaṇvo durvāsā bhṛguraṃgirāḥ|

kaśyapo vāmadevo'trirvasiṣṭho nāradādayaḥ|| 12

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने ऐसे परम मंगलमय और पुण्य-प्रापक कर्म किये, जिनका गान करनेवाले लोगोंके सारे कलिमल नष्ट हो जाते हैं। अब भगवान् श्रीकृष्ण महाराज उग्रसेनकी राजधानी द्वारकापुरीमें वसुदेवजीके घर यादवोंका संहार करनेके लिये कालरूपसे ही निवास कर रहे थे। उस समय उनके विदा कर देनेपर—विश्‍वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारकाके पास ही पिण्डारकक्षेत्रमें जाकर निवास करने लगे थे॥ ११-१२॥

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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