श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

ववन्द आत्मानमनन्तमच्युतो४

जिष्णुश्‍च तद्दर्शनजातसाध्वसः।

तावाह५ भूमा परमेष्ठिनां प्रभु-

र्बद्धांजली सस्मितमूर्जया गिरा॥ ५८

vavanda ātmānamanantamacyuto

jiṣṇuśca taddarśanajātasādhvasaḥ|

tāvāha bhūmā parameṣṭhināṃ prabhu-

rbaddhāṃjalī sasmitamūrjayā girā|| 58

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने अपने ही स्वरूप श्रीअनन्त भगवान्‌को प्रणाम किया। अर्जुन उनके दर्शनसे कुछ भयभीत हो गये थे; श्रीकृष्णके बाद उन्होंने भी उनको प्रणाम किया और वे दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये। अब ब्रह्मादि लोकपालोंके स्वामी भूमा पुरुषने मुसकराते हुए मधुर एवं गम्भीर वाणीसे कहा—॥ ५८॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    जं तमच्युतं।

    (मुद्रित पृष्ठ 699)
  2. ५

    स चाह भूम्‍नां पर०।

    (मुद्रित पृष्ठ 699)

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