श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

तस्मिन् महाभीममनन्तमद्भुतं

सहस्रमूर्धन्यफणामणिद्युभिः२ ।

विभ्राजमानं द्विगुणोल्बणेक्षणं

सिताचलाभं शितिकण्ठजिह्वम्३॥ ५४

tasmin mahābhīmamanantamadbhutaṃ

sahasramūrdhanyaphaṇāmaṇidyubhiḥ |

vibhrājamānaṃ dviguṇolbaṇekṣaṇaṃ

sitācalābhaṃ śitikaṇṭhajihvam|| 54

अर्थ

उसी महलमें भगवान् शेषजी विराजमान थे। उनका शरीर अत्यन्त भयानक और अद्भुत था। उनके सहस्र सिर थे और प्रत्येक फणपर सुन्दर-सुन्दर मणियाँ जगमगा रही थीं। प्रत्येक सिरमें दो-दो नेत्र थे और वे बड़े ही भयंकर थे। उनका सम्पूर्ण शरीर कैलासके समान श्‍वेतवर्णका था और गला तथा जीभ नीले रंगकी थी॥ ५४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    द्युतिं।

    (मुद्रित पृष्ठ 699)
  2. ३

    ण्ठभूषणं।

    (मुद्रित पृष्ठ 699)

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