श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

ततः प्रविष्टः सलिलं नभस्वता

बलीयसैजद‍्बृहदूर्मिभूषणम्१ ।

तत्राद्भुतं वै भवनं द्युमत्तमं

भ्राजन्मणिस्तम्भसहस्रशोभितम् ॥ ५३

tataḥ praviṣṭaḥ salilaṃ nabhasvatā

balīyasaijadbṛhadūrmibhūṣaṇam |

tatrādbhutaṃ vai bhavanaṃ dyumattamaṃ

bhrājanmaṇistambhasahasraśobhitam || 53

अर्थ

इसके बाद भगवान्‌के रथने दिव्य जलराशिमें प्रवेश किया। बड़ी तेज आँधी चलनेके कारण उस जलमें बड़ी-बड़ी तरंगें उठ रही थीं, जो बहुत ही भली मालूम होती थीं। वहाँ एक बड़ा सुन्दर महल था। उसमें मणियोंके सहस्र-सहस्र खंभे चमक-चमककर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और उसके चारों ओर बड़ी उज्ज्वल ज्योति फैल रही थी॥ ५३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    भीषणं।

    (मुद्रित पृष्ठ 699)

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