॥ श्रीहरिः ॥
नाहं संकर्षणो ब्रह्मन् न कृष्णः कार्ष्णिरेव च।
अहं वा अर्जुनो नाम गाण्डीवं यस्य वै धनुः॥ ३३
nāhaṃ saṃkarṣaṇo brahman na kṛṣṇaḥ kārṣṇireva ca|
ahaṃ vā arjuno nāma gāṇḍīvaṃ yasya vai dhanuḥ|| 33
अर्थ
अर्जुनने कहा—ब्रह्मन्! मैं बलराम, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न नहीं हूँ। मैं हूँ अर्जुन, जिसका गाण्डीव नामक धनुष विश्वविख्यात है॥ ३३॥
नाहं संकर्षणो ब्रह्मन् न कृष्णः कार्ष्णिरेव च।
अहं वा अर्जुनो नाम गाण्डीवं यस्य वै धनुः॥ ३३
अर्जुनने कहा—ब्रह्मन्! मैं बलराम, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न नहीं हूँ। मैं हूँ अर्जुन, जिसका गाण्डीव नामक धनुष विश्वविख्यात है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 696) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/89/33/