श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

धनदारात्मजापृक्ता यत्र शोचन्ति ब्राह्मणाः।

ते वै राजन्यवेषेण नटा जीवन्त्यसुम्भराः॥ २९

dhanadārātmajāpṛktā yatra śocanti brāhmaṇāḥ|

te vai rājanyaveṣeṇa naṭā jīvantyasumbharāḥ|| 29

अर्थ

जिनके राज्यमें धन, स्त्री अथवा पुत्रोंसे वियुक्त होकर ब्राह्मण दुःखी होते हैं, वे क्षत्रिय नहीं हैं, क्षत्रियके वेषमें पेट पालनेवाले नट हैं। उनका जीवन व्यर्थ है॥ २९॥✎ 897

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #897 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥जो → २४॥ जो

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