श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः।

स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन् निर्गुणो भवेत्॥ ५

harirhi nirguṇaḥ sākṣāt puruṣaḥ prakṛteḥ paraḥ|

sa sarvadṛgupadraṣṭā taṃ bhajan nirguṇo bhavet|| 5

अर्थ

परन्तु परीक्षित्! भगवान् श्रीहरि तो प्रकृतिसे परे स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकृत गुणरहित हैं। वे सर्वज्ञ तथा सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं। जो उनका भजन करता है, वह स्वयं भी गुणातीत हो जाता है॥ ५॥✎ 896

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #896 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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