श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

तदा महाकारुणिकः स धूर्जटि-

र्यथा वयं चाग्‍निरिवोत्थितोऽनलात्।

निगृह्य दोर्भ्यां भुजयोर्न्यवारयत्

तत्स्पर्शनाद् भूय उपस्कृताकृतिः॥ १९

tadā mahākāruṇikaḥ sa dhūrjaṭi-

ryathā vayaṃ cāgnirivotthito'nalāt|

nigṛhya dorbhyāṃ bhujayornyavārayat

tatsparśanād bhūya upaskṛtākṛtiḥ|| 19

अर्थ

परीक्षित्! जैसे जगत‍्में कोई दुःखवश आत्महत्या करने जाता है तो हमलोग करुणावश उसे बचा लेते हैं, वैसे ही परम दयालु भगवान् शंकरने वृकासुरके आत्मघातके पहले ही अग्‍निकुण्डसे अग्‍निदेवके समान प्रकट होकर अपने दोनों हाथोंसे उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और गला काटनेसे रोक दिया। उनका स्पर्श होते ही वृकासुरके अंग ज्यों-के-त्यों पूर्ण हो गये॥ १९॥

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