श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

देवोपलब्धिमप्राप्य निर्वेदात् सप्तमेऽहनि।

शिरोऽवृश्‍चत् स्वधितिना तत्तीर्थक्लिन्‍नमूर्धजम्॥ १८

devopalabdhimaprāpya nirvedāt saptame'hani|

śiro'vṛścat svadhitinā tattīrthaklinnamūrdhajam|| 18

अर्थ

इस प्रकार छः दिनतक उपासना करनेपर भी जब उसे भगवान् शंकरके दर्शन न हुए, तब उसे बड़ा दुःख हुआ। सातवें दिन केदारतीर्थमें स्नान करके उसने अपने भीगे बालवाले मस्तकको कुल्हाड़ेसे काटकर हवन करना चाहा॥ १८॥

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