श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्।

सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम्॥ ५४

na brāhmaṇānme dayitaṃ rūpametaccaturbhujam|

sarvavedamayo vipraḥ sarvadevamayo hyaham|| 54

अर्थ

मुझे अपना यह चतुर्भुजरूप भी ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय है और मैं सर्वदेवमय हूँ॥ ५४॥

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