श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.52

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

देवाः क्षेत्राणि तीर्थानि दर्शनस्पर्शनार्चनैः।

शनैः पुनन्ति कालेन तदप्यर्हत्तमेक्षया॥ ५२

devāḥ kṣetrāṇi tīrthāni darśanasparśanārcanaiḥ|

śanaiḥ punanti kālena tadapyarhattamekṣayā|| 52

अर्थ

देवता, पुण्यक्षेत्र और तीर्थ आदि तो दर्शन, स्पर्श, अर्चन आदिके द्वारा धीरे-धीरे बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं; परन्तु संत पुरुष अपनी दृष्टिसे ही सबको पवित्र कर देते हैं। यही नहीं; देवता आदिमें जो पवित्र करनेकी शक्ति है, वह भी उन्हें संतोंकी दृष्टिसे ही प्राप्त होती है॥ ५२॥

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