श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

एकदा गृहमानीय आतिथ्येन निमन्त्र्य तम्।✎ 2139

श्रद्धयोपहृतं भैक्ष्यं बलेन बुभुजे किल॥ ५

ekadā gṛhamānīya ātithyena nimantrya tam|

śraddhayopahṛtaṃ bhaikṣyaṃ balena bubhuje kila|| 5

अर्थ

एक दिन बलरामजीने आतिथ्यके लिये उन्हें निमन्त्रित किया और उनको वे अपने घर ले आये। त्रिदण्डी-वेषधारी अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त श्रद्धाके साथ भोजन-सामग्री निवेदित की और उन्होंने बड़े प्रेमसे भोजन किया॥ ५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2139 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ तम्। → मन्त्र्य तम्।

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