एक दिन बलरामजीने आतिथ्यके लिये उन्हें निमन्त्रित किया और उनको वे अपने घर ले आये। त्रिदण्डी-वेषधारी अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त श्रद्धाके साथ भोजन-सामग्री निवेदित की और उन्होंने बड़े प्रेमसे भोजन किया॥ ५॥
एकदा गृहमानीय आतिथ्येन निमन्त्र्य तम्।
श्रद्धयोपहृतं भैक्ष्यं बलेन बुभुजे किल॥ ५
एक दिन बलरामजीने आतिथ्यके लिये उन्हें निमन्त्रित किया और उनको वे अपने घर ले आये। त्रिदण्डी-वेषधारी अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त श्रद्धाके साथ भोजन-सामग्री निवेदित की और उन्होंने बड़े प्रेमसे भोजन किया॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 660) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)