प्रिय परीक्षित्! जैसे राजा बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्ण और मुनि-मण्डलीके पधारनेपर आनन्दमग्न हो गये थे, वैसे ही श्रुतदेव ब्राह्मण भी भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियोंको अपने घर आया देखकर आनन्दविह्वल हो गये; वे उन्हें नमस्कार करके अपने वस्त्र उछाल-उछालकर नाचने लगे॥ ३८॥
श्रुतदेवोऽच्युतं प्राप्तं स्वगृहांजनको यथा।
नत्वा मुनीन् सुसंहृष्टो धुन्वन् वासो ननर्त ह॥ ३८
प्रिय परीक्षित्! जैसे राजा बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्ण और मुनि-मण्डलीके पधारनेपर आनन्दमग्न हो गये थे, वैसे ही श्रुतदेव ब्राह्मण भी भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियोंको अपने घर आया देखकर आनन्दविह्वल हो गये; वे उन्हें नमस्कार करके अपने वस्त्र उछाल-उछालकर नाचने लगे॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 664) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/38/